भारत में आलू रबी की महत्वपूर्ण फसल है जो पुरे वर्ष बिकने वाली एक ऐसी सब्जी है जिसका उपयोग दुनिया के प्रत्येक रसोंई घर, ढाबा, रेस्टुरेंट, होटल इत्यादि जगह किया जाता है और इसकी डिमांड बाजार में हमेशा बनी रहती है इसलिए इसे सब्जियों का राजा भी कहा जाता है |

यदि आलू को अच्छे से स्टोर किया जाय तो इसे कई महीनों तक रखा जा सकता है और जैसे ही इसके मंडियों में अच्छे भाव आये इसे बेचकर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं. ऐसे में अगर आप आलू की खेती करके मालामाल बनना चाहते हैं तो आपको कम खर्च में अधिक पैदावार देने वाली आलू की किस्मों का चयन करना होगा |
तो आइये जानते हैं की वो कौन सी आलू की उन्नत किस्में हैं जिसकी खेती करके आप बहुत ही कम लागत में अधिक मुनाफा कमाकर मालामाल हो सकते हैं |
ज्यादा पैदावार देने वाली आलू की उन्नत किस्में
अक्सर देखा जाता है की अधिकांश किसान आलू की बुआई के लिए एक ही बीज की बुवाई कई वर्षों तक करते हैं. जिससे न ही आलू का अच्छा उत्पादन हो पाता है और न ही किसानों को उनकी मेहनत तथा लागत के हिसाब से अच्छी आमदनी मिल पाती है. ऐसे में आपको अच्छे आलू की वैरायटी चयन करना चाहिए. यहाँ आलू की टॉप उन्नत किस्में एवं उनकी विशेषताएं दी गई हैं जिनसे आपको अधिक पैदावार मिलेगी |
कुफरी अलंकार (Kufri Alankar)
भारत के उत्तरी क्षेत्र में उगाई जाने वाली आलू की यह प्रजाति प्रति हेक्टेयर 200-250 क्विंटल तक उपज देती है जो 2 से 2.5 महीने में तैयार हो जाती है. कुफरी अलंकार की बुवाई 15 अक्तूबर से 15 नवंबर तक की जाती है बुवाई के लिए इसके कंदों का ब्यास 2-5 से 5-5 सेमी रखना चाहिए. इस किस्म के आलू के कंद सफ़ेद रंग के होते है साथ यह पछेती अंगमारी रोग के लिए प्रतिरोधी है |
जे ई एक्स सी- 166
आलू की इस किस्म को तैयार होने में 3 महीने के आसपास का समय लगता है यह किस्म भारत के उत्तरी राज्यों में अधिक मात्रा में उगाई जाती है. इस प्रजाति की औसत उत्पादन 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है इसके पौधे की बढवार एक सामान्य ऊंचाई तक विकसित होते हैं |
जी- 2524 (कुफरी नवताल)
आलू की यह किस्म उत्तर भारत के मैदानी इलाके तथा पर्वतीय क्षेत्रों में उगाने के लिए अनुकूल प्रजाति है. यह आलू की अगेती किस्म है जो बुवाई के 75 से 85 दिन में खुदाई करने के लिए तैयार हो जाती है. इस किस्म की औसत पैदावार प्रति हेक्टेयर 200 से 250 क्विंटल है इसके कंद सफ़ेद एवं बड़े रंग के होते हैं |
जे. ऍफ़. 5106
उत्तर भारत के मैदानी इलाकें बोई जाने वाली जे. ऍफ़. 5106 आलू एक संकर किस्म है जिसके कंद लम्बे सफ़ेद व आकर्षक होते है. यह बुवाई करने के 75-80 दिनों में तैयार होती है जिसकी औसत उत्पादन प्रति एकड़ 250 से 280 क्विंटल है. इसकी सबसे अच्छी खासियत यह है की इसपर कई तरह के रोगों का असर नहीं होता है |
पुपरी बिहार (Kufri Behar)
यह किस्म भारत के मैदानी इलाकों के लिए अनुकूल है यह देर से पकने वाली आलू की प्रजाति है जो 3 से 3.5 महीने में पककर तैयार होती है. इसके बीज अंकुरित के होने के लिए 25 डिग्री सेल्सियस तापमान की जरुरत होती है इसकी औसत उत्पादन प्रति हेक्टेयर 200 से 250 क्विंटल तक है |
कुफरी नीलकंठ (Kufri Neelkanth)
कुफरी नीलकंठ आलू अत्यधिक ठंठ को भी सहन करने के लिए अनुकूल है. इसकी बुवाई उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र तथा पंजाब ,हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अधिक होती है. इस किस्म की औसत पैदावार प्रति हेक्टेयर खेत में 350 से 400 क्विंटल तक है. यह 90 से 100 दिनों में पककर तैयार होती है |
ई – 4,486
आलू की इस किस्म के कंद मध्यम आकार के व सफ़ेद रंग के होते है जिसे तैयार होने में 135 दिन तक का टाइम लगता है. इसकी खेती मुख्य रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, पश्चिम बंगाल तथा मध्य प्रदेश के इलाकों में की जाती है. इस प्रजाति के पौधों का प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 250 से 300 क्विंटल है |
कुफरी चिप्सोना (Kufri Chipsona)
आलू के इस प्रजाति की खेती उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल व मध्य प्रदेश के लिए अनुकूल है. यह किस्म पिछेता झुलसा रोग के लिए प्रतिरोधी है आलू की यह किस्म चिप्स बनाने के लिए पुरे देश में फेमस मानी जाती है. इसकी औसत उत्पादन प्रति हेक्टेयर 300 से 350 कुंटल है जो 4 महीने में पककर तैयार होती है |
कुफरी पुखराज(Kufri Pukhraj)
आलू के इस किस्म की खेती उत्तर पूर्वी मैदानी इलाकों के साथ भारत के लगभग सभी राज्यों में की जाती है. इस किस्म की बुवाई के लिए अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से 15 नवंबर तक का समय अनुकूल होता है. यह प्रजाति प्रति एकड़ खेत में 140 से 160 क्विंटल उत्पादन देती है जो 3 महीने में तैयार होती है |
कुफरी संगम (Kufri Sangam)
आलू की यह किस्म एक हेक्टेयर में 300 से 350 कुंतल की बम्पर उत्पादन देती है जो 90 से 100 दिनों में पककर खुदाई के लिए तैयार होती है. इस किस्म की सबसे अच्छी खासियत यह है की इसपर प्रतिकिल मौसम का कोई असर नहीं होता है. इस प्रजाति की बुवाई उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में की जाती है |